जीवन के पहले 1,000 दिनों के पोषण का बच्चे के स्वास्थ्य और विकास पर सबसे गहरा प्रभाव पड़ता है।
ज़रूरत के मुताबिक पोषण न मिलने से दिमाग का विकास धीमा हो जाता है और शारीरिक विकास रुक जाता है। ग्रामीण भारत में, खास तौर पर दूर-दराज़ के गाँवों में सात माह से तीन वर्ष के बच्चों में कुपोषण का खतरा सबसे ज्यादा है। हालाँकि ये बच्चे, टेक होम राशन, प्रतिरोधक टीकों, और स्वास्थ्य सेवाओं के पात्र हैं, लेकिन इन चीजों तक उनकी पहुँच सुनिश्चित करने के रास्ते में कई कारण बाधा बनते हैं। इनमें, सबसे बड़ा कारण भौगोलिक परिस्थितियाँ और बुनियादी सुविधाओं की कमी तो है ही, साथ ही बच्चों की देखभाल करने वालों में जागरूकता की कमी भी है।

इसके अलावा, माता-पिता काम पर जाते वक्त, अपने बच्चों को उनके बड़े भाई बहनों या दादा-दादी/ नाना नानी के पास छोड़ देते हैं। इसका बच्चों के पोषण और विकास पर बहुत असर पड़ता है।
ऊपर दिये कारणों को ध्यान में रखते हुए अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन ने शिशु घर सेवा शुरू की है, जिसका प्रयास वंचित समुदाय के सात माह से तीन वर्ष के बच्चों की पोषण स्थिति को सुधारना है। इस शिशु घर पहल के मुख्य उद्देश्य निम्न हैं-
- बच्चों को सुरक्षित माहौल उपलब्ध कराना
- बच्चों को तीन वक़्त पोषण युक्त आहार उपलब्ध कराना, जिसमें हर रोज़ एक अंडा भी शामिल है।
- कुपोषण के शिकार बच्चों की पहचान करना तथा फॉलोअप और रेफरल के जरिये कुपोषण का निदान करने की कोशिश करना।
अभी, बिहार, छत्तीसगढ़ और झारखंड, कर्नाटक और उड़ीसा में इस तरह के 1100 शिशु घर चल रहे हैं। इनमें 16000 बच्चे नामांकित हैं। ये पहल 25 समाज सेवी संस्थाओं के साथ साझेदारी से चल रही है।
इन शिशु घरों का पहला मकसद छोटे बच्चों को सुरक्षित वातावरण और पोषण युक्त आहार उपलब्ध कराना है। इसके अलावा शिशु घर समुदाय के लिए कई मायनों में फायदेमंद है। इससे युवा महिलाओं को रोज़गार मिलता है, बच्चों के स्वास्थ्य की बेहतर देखभाल हो पाती है और हम एक स्वास्थ समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ते हैं।
इसमें, ख़तरे के निशान को पार करने वाले बच्चों (यानी, कम वज़न वाले बच्चों) को आगे की देखभाल के लिए ग्राम स्वास्थ्य स्वच्छता एवं पोषण सुविधा, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सुविधा या पोषण पुनर्वास केंद्र भेजा जाता है।
कम वज़न वाले बच्चों को उनकी ज़रूरत और क्षमता के मुताबिक पोषण से भरपूर आहार उपलब्ध कराया जाता है।
शिशु घरों के संचालन के अपने अनुभवों के आधार पर फाउंडेशन ने सारी समझ और सीख को समेटकर के विस्तृत शिशु घर परिचालना का दस्तावेज़/ प्रोटोकॉल बनाया है। इसमें सुरक्षा और बचाव के मानक प्रावधान; देखभाल करने वालों के लिए काम करने के तरीके और ट्रेनिंग माड्यूल; ज़रूरी संसाधन और सामाग्री और शिशु घर की मासिक सूचना को व्यवस्थित करने का विवरण है।
पूरा दस्तावेज़ यहाँ देखा जा सकता है
उड़ीसा के एक दूर-दराज़ गाँव मच्छाडपांगा बचपन को एक बार फिर से, देखभाल, पोषण और शिक्षा के माध्यम से देखा गया है। इस लघुफिल्म में एक छोटी बच्ची श्रीमा दिखती है जिसका दिन एक शिशु घर में बीतता है, जो अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के सहयोग से चलता है। एक ऐसा सुरक्षित परवरिश का स्थान, जहाँ वह तीन वक्त अच्छा भोजन करती है, और साथ ही खेलती और सीखती है और पूरे उत्साह के साथ उसकी देखभाल की जाती है।
